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Art of Healthy Living

स्वस्थ रहने की कला (Art of Healthy Living)
उत्तम जीवन जीने के लिए सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करना चाहिए। “शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक स्वस्थता की पूर्ण अवस्था” ही सम्पूर्ण स्वास्थ्य की परिभाषा है। जब कोई व्यक्ति विभिन्न शारीरिक रोगों से ग्रसित रहता है तो उसे शारीरिक रूप से रोगग्रस्त माना जाता है।

जब कोई व्यक्ति तनाव, चिन्ता, नकारात्मक सोच से ग्रसित रहता है तो उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ माना जाता है।

> जब कोई व्यक्ति निरन्तर अपने परिजनों. सम्बन्धियों और मित्रों के साथ कलह करता है तो उसे सामाजिक रूप से अस्वस्थ माना जाता है। जब कोई व्यक्ति क्रोध, लालच, अहंकार, घृणा, ईर्ष्या इत्यादि से ग्रसित रहता है तो उसे भावनात्मक अस्वस्थ माना जाता है।

जब व्यक्ति मोह और उलझनों के साथ अशान्त रहता है तो उसे आध्यात्मिक रूप से अस्वस्थ माना जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग द्वारा सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है।

याद रखें : प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं, इनको छोड़कर अन्य कोई भी चिकित्सा पद्धति पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान नहीं कर सकती।

प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा सिर्फ एक उपचार ही नहीं बल्कि जीने की कला भी है। रोग जड़ से निकल जाता है तथा अन्य सभी रोग भी ठीक हो जाते हैं। दूसरे विकार पैदा नहीं होते क्योंकि दवाएँ नहीं खानी पड़तीं।

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली दोहरा कार्य करती है। प्रथम कार्य रोगी को शीघ्रतम रोग मुक्त करना, द्वितीय कार्य प्रशिक्षित करना कि वह भविष्य में अपने को रोग मुक्त रख सके।

जब सभी अन्य इलाज असफल हो जाते हैं तब भी प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज सम्भव है।

रोगों का कारण

सभी रोगों का एक ही कारण है, वह है शरीर में विजातीय द्रव्यों (Waste Products) का इकट्ठा हो जाना। अर्थात् शरीर की गंदगी शरीर में ही इकट्ठी हो जाना।

विजातीय द्रव्यों (Waste Products) के साधन

1. जैसे-जैसे भोजन को पकाया, तला या भूना जाता है, वैसे-वैसे उसकी पौष्टिकता नष्ट होती जाती है तथा उसमें विजातीय द्रव्य बढ़ते जाते हैं।

2. साँस द्वारा भी गंदगी अंदर जाती है, वो इस बात पर निर्भर है कि हम कितने दूषित वातावरण में रहते हैं।

3. शरीर में विभिन्न भौतिक एवं रासायनिक क्रियाएँ होती रहती हैं उनका बचा हुआ पदार्थ (By-products)।
5. शरीर के पुराने कोष (Cells) नष्ट होते रहते है तथा नये बनते रहते हैं। नष्ट हुए कोष शरीर के लिये विजातीय द्रव्य हो जाते हैं। भय, चिन्ता, क्रोध, ईर्ष्या, तनाव इत्यादि से शरीर में विषेले पदार्थ बनते रहते हैं। .

विजातीय द्रव्यों के संचित होने का कारण

वैसे तो प्रकृति शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन करती रहती है, फिर भी ये इकट्ठे हो जाते हैं जिसके तीन मुख्य कारण है

भोजन इत्यादि द्वारा विजातीय द्रव्य शरीर में ज्यादा जाये और शरीर उतना निकाल नहीं पाये। 1.

शरीर की गंदगी मल, मूत्र, पसीना तथा साँस द्वारा बाहर निकलती है। इनमें रुकावट आ जाने से। 2.

(i) मल-आँतों में चिपक जाता है। जो सड़ने लगता है जिससे विषैले पदार्थ (Toxins) एवं गैस बनती रहती है।

आँतों से भोजन पचाने के लिए रस (Enzymes) निकलते हैं। रुकावट होने की वजह से वे कम निकलेंगे जिससे पाचन ठीक नहीं हो पायेगा।

पचा हुआ भोजन आँतों में कम अवशोषण होगा जिसकी वजह से शरीर में विभिन्न पौष्टिक पदार्थों (खनिज, विटामिन एवं पोषण) की कमी हो जायेगी।

(ii) मूत्र-गुर्दे रक्त को छानकर त्याज्य भाग (Waste Products) हानिकारक पदार्थ एवं पानी से मूत्र निर्माण करते हैं। कम पानी पीना या अधिक नमक के प्रयोग इत्यादि से गुर्दो के फिल्टर रुक जाते हैं जिससे रक्त की गंदगी रक्त में रह जाती है।

(iii) पसीना-त्वचा भी पसीने के रूप में शरीर की गंदगी बाहर निकालती है। यदि इसके रोमकूप (Pores) बन्द हो जायें तो त्वचा से निकलने वाली गंदगी शरीर में रह जायेगी।

(iv) साँस-श्वसन संस्थान उड़ने वाले त्याज्य द्रव्यों (कार्बन डाइऑक्साइड इत्यादि) जलवाष्प इत्यादि को शरीर से बाहर निकालता है। यदि गहरी साँस नहीं लेंगे अर्थात् फेफड़े पूरी तरह नहीं फैलेंगे तो ऑक्सीजन पूरी तरह से शरीर में नहीं जा पायेगी तथा कार्बन डाइऑक्साइड इत्यादि पूरी तरह से शरीर से बाहर नहीं आ पायेगी।

3. इन विजातीय द्रव्यों के बढ़ जाने पर शरीर के अंगों के कार्य में रुकावट आ जाती है एवं कीटाणु पनपते लगते हैं। किन्तु प्रकृति फिर भी उसे ज्वर, दस्त, उल्टी, जुकाम, खाँसी इत्यादि तीव्र रोगों (Acute Diseases) के माध्यम से बाहर निकालती है। लेकिन जब इस प्रक्रिया को दवाओं इत्यादि से दबाया जाता है तो बाद में असाध्य रोग (Chronic Disease) हो जाते हैं।

सभी रोगों का उपचार

सभी रोगों का एक ही उपचार है, वह है शरीर में संचित विजातीय द्रव्यों को प्राकृतिक साधनों द्वारा बाहर निकालना।

इस पद्धति में किसी रोग विशेष का उपचार नहीं होता, बल्कि रोगी के समस्त शरीर का उपचार होता है।

उपचार के लिए प्राकृतिक साधन

उपवास (Fasting)-यह अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने या खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने का उत्तम साधन है। इसलिए उपवास रोगी एवं निरोगी दोनों के लिए आवश्यक है।

शरीर के भीतरी दूषित पदार्थों को बाहर निकालना उपवास का प्रमुख कार्य है। क्योंकि भोजन पचाने के काम से फुरसत मिलने के कारण हमारी जीवनी शक्ति रोग के कारणों को दूर करने में लग जाती है।

उपवास एक दिन का भी हो सकता है और कई-कई दिन का भी हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को सप्ताह में एक दिन का उपवास तो करना ही चाहिये। लम्बा उपवास रोग विशेष पर निर्भर करता है, जो उचित निर्देशन में ही करना चाहिये।

उपवास विधि-दिन भर किसी प्रकार का भोजन नहीं लेना चाहिये। दिन भर में 2-27 लीटर पानी पीना और उसमें 2-3 नींबू का रस डाल कर कई बार पीना चाहिये। यदि इससे काम न चले तो फल या सब्जी का रस ले सकते हैं। जो आरम्भ में पूर्ण उपवास न कर सकें, वे एक समय फल ले सकते हैं।

उपवास कभी ठोस आहार से नहीं तोड़ना चाहिये। सर्वप्रथम अच्छी तरह पके सन्तरे अथवा मौसमी या अंगूर का रस अथवा अन्य फल या सब्जी के रस से ही तोड़ना चाहिये। छोटा उपवास फलों से तोड़ा जा सकता है।

आजकल लोग उपवास को पकवान (गरिष्ठ भोजन) से तोड़ते हैं जिससे लाभ की बजाय हानि अधिक होती है।

अपक्वाहार (Uncooked Food)-अपक्वाहार का सीधा-स -सादा अर्थ है कि आप अपनी क्षमतानुसार जो खाद्य पकाकर खाते हैं, उसे अपक्व (Uncooked) ही लें।

जैसे मौसम के ताजे फल, हरी सब्जियाँ, सलाद, अंकुरित अन्न कण, काष्ठज फल इत्यादि। रोगों से लड़ने के लिए अपक्वाहर एक ब्रह्म-अस्त्र है एवं स्वस्थ एवं आनन्दमय जीवन के लिये अमृत-तुल्य है। आहार का सुधार । कर मनुष्य के सब रोग दूर किये जा सकते हैं।

नोट-काष्ठज फल (बादाम, काजू, मूंगफली इत्यादि) किशमिश, अंजीर, छुआरा भिगोकर ही खाना चाहिए।

प्राकृतिक खाद्यों (फल, सलाद, अंकुरित, रस इत्यादि) में नमक का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

उषापान (Morning Drink)-तांबे या चाँदी के बर्तन में रात का रखा हुआ पानी चार गिलास तक प्रातः ही शौच जाने से पूर्व पीना चाहिए। इससे व्यक्ति अनेकानेक रोगों से मुक्त रहता है।

मिट्टी की पट्टी (Mud Pack)-उदर के सभी रोगों में इसका विशेष महत्व है। इसका प्रयोग पेडू, पेट, छाती, माथा, आँख, सिर, मेरुदण्ड, गला, पाँव, गुदा इत्यादि जहाँ आवश्यकता हो, कर सकते हैं। . 16 उत्तम जीवन जीने की कला


एनीमा (Enema)-यह चिकित्सा जगत में आँतों को साफ करने की सर्वाधिक सुरक्षित विधि है। इससे कब्ज से छुटकारा मिलता है।

कटि स्नान (Hip Bath)-उदर के सभी विकारों को स्थायी रूप से लाभ पहुँचाता है। ऐसा कोई रोग नहीं है जिसमें कटिस्नान से फायदा न पहुँचता हो।

भाप स्नान (Steam Bath)-त्वचा के रोमकूप खुल जाते हैं जिससे हमारे अन्दर की गन्दगी तेजी से निकलती है। यह प्राय: सभी रोगों में लाभ करता है।

पैरों का गरम स्नान (Hot Foot Bath) सर्दी जुकाम अनिद्रा रक्तचाप, बेहोशी एवं दमा के दौरे में यह बहुत लाभ पहुँचाता है। जिन स्त्रियों को बीच-बीच में मासिक बन्द हो जाता है । यदि कुछ समय तक यह स्नान लें तो बहुत लाभ होता है।

रीढ़ स्नान (Spinal Bath) रक्तचाप (BP), अनिद्रा बेहाशी थकावट, दुर्बलता, स्नायविक तनाव आदि रोगों में लाभ करता है तथा र संचार सही करता है।

मेहन स्नान (Sitz Bath) स्वप्न दोष प्रदर (1 cucorrhoica) स्नायु दुर्बलता आदि से छुटकारा मिलता है। क्रोधी स्वभाव और धीर शान ” । स्नायु शूल (Neuralgia) और साइरिक ग पहुँचता है। स्त्रियों के हिस्टोरिया एवं अन्य सभी लोगों से सजा पहुँचाता है। जाता है।

गर्म-ठंडा सेक (Hot and Cold Fomentations सो मरम्मत करने अथवा दर्द से आराम के लिये बारी बारी से पानी को जल के प्रयोग से अधिक लाभदायक अन्य और उपचार करते है पर गर्म ठंडा सेक पुराना का वायु विकार एक दुबलता र सहायक होता है।

लपेट (Compress) यह थाईराइड पैरा भाईहर सासले जिगर, मधुमेह, गुर्दे, गठिया, उभरी शिराय माटापा इत्यादि राना में लाभदायक है कुन्जल (Kunyal) – इसके करन से कपाल दाप महास जिव्हारोग, रुधिर विकार कक्षस्थल के रोग कब्ज वात पिन कफ प्रकाप रतौंधी, खाँसी, दमा, मुँह सूखना, कटमाला इत्यादि अनेक बीमारियों दूर होती

स्नायु गीली चादर लपेट (Wet Sheet Pack)-ज्वर की अवस्था में, तन्तुओं को बल देने के लिये, शरीर से मल निकालने और विजातीय द्रव्य निष्कासन के लिये इस लपेट का प्रयोग किया जाता है। इस लपेट के द्वारा शरीर से इतना विष निकलता है कि लपेट खोलते समय उससे एक प्रकार की गन्ध-सी निकलने लगती है। जिनके शरीर में अधिक दूषित पदार्थ रहता है. उनके शरीर से निकले विकार के कारण चादर भी गन्दे पीले रंग की हो जाती है।
जलनेति (Jalneti)-गले के ऊपर के समस्त रोग (सिरदर्द, अनिद्रा, अतिनिद्रा, बालों का झड़ना तथा पकना, नाक के अन्दर फोड़े और बढ़ा

माँस, नजला, जुकाम, नेत्र विकार, कम सुनना, मिरगी इत्यादि) दूर होते हैं। सूर्य किरण चिकित्सा-सूर्य किरणें सात रंगों का मिश्रण हैं और सभी रंगों में औषधीय गुण हैं जिन्हें पानी, शहद, घी, तेल इत्यादि में जज्ब कर उनका लाभ लिया जा सकता है। (पानी पीने के लिये, तेल केवल बाहरी प्रयोग के लिये, घी रीढ़ की मालिश के लिये, शहद यात्रा के लिये)। सूर्य दर्शन-सूर्योदय के समय सूर्य की लालिमा देखने से नेत्र रोग दूर होते हैं।

सूर्य स्नान-सूर्य स्नान से कमजोर हड्डियों, दन्त रोग, मन्दाग्नि, ज्ञानतन्तु तथा माँसपेशी सम्बधी रोगों में लाभ मिलता है।

योग


18(iv) ब्रह्मचर्य-मन, वाणी और शरीर से होने वाले सब मैथुनों का सब अवस्थाओं में त्याग करके सब प्रकार से वीर्य की रक्षा करना ब्रह्मचर्य है।
(v) अपरिग्रह-अनावश्यक सामग्री का संचय न करना ही अपरिग्रह है। (2) नियम






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