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Work and Destiny

कर्म और भाग्य (Work and Destiny)

कर्म से ही भाग्य बनता है। कर्म करना होता है और भाग्य (फल) मिलना होता है। अर्थात् भाग्य का निर्माता मनुष्य स्वयं है। जैसे मनुष्य के कर्म होंगे, वैसा ही उसका भाग्य होगा। अकर्मण्य और आलसी प्राणी जिसे भाग्य कहता है, कर्मशील और उद्यमी उसी को कर्म कहता है। मनुष्य के किस कर्म का फल कब और किस जन्म में मिलेगा, यह प्रकृति के अधीन है।

विभिन्न कर्मफलों के कारण कोई सम्पन्न परिवार में जन्म लेता है और कोई निर्धन परिवार में। यद्यपि दोनों एक ही स्थान तथा एक ही वातावरण में जन्म लेते हैं परन्तु फिर भी उनमें आपस में भिन्नता रहती है। इससे यह स्पष्ट है कि विशेष प्रकार का कर्म करने के कारण ही जीवन को विशेष शरीर प्राप्त होता है। यह क्रिया (बार-बार जन्म एवं मृत्यु) अनन्त काल से चली आ रही है। किसी भी व्यक्ति के समस्त कर्मों तथा उनके फलों का पता नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वे सृष्टि के आरम्भ से लेकर अगले कल्प तक चलते रहेंगे।

“क्यों एक व्यक्ति सुखी तो दूसरा दुःखी है? क्यों एक समृद्ध व खुश तो दूसरा दीन व गरीब है? क्यों एक के पास अच्छा स्वास्थ्य व सोच और दूसरे के पास कुछ भी नहीं है?” 19

आज हम जिस भी अच्छी-बुरी स्थिति में खड़े हैं, वह हमारे अपने ही पिछले अच्छे-बुरे कर्मों का फल है। इससे यह भी स्पष्ट है कि कल हम जो कुछ भी होंगे, वह हमारे आज के शुभ या अशुभ कर्मों का फल होगा। अतः कह सकते हैं कि मनुष्य खुद ही अपने भाग्य को बनाने या बिगाड़ने वाला है। उसका भाग्य उसके अपने हाथ में है।

स्थूल और सूक्ष्म दोनों दृष्टि से सृष्टि का यह मौलिक नियम है कि भाग्य कभी अपने आप नहीं बनते, वरन वह व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखे जाते हैं। सौभाग्य या दुर्भाग्य सदैव अपने ही कर्म का फल होता है। एक आदमी मन्द बुद्धि वाला और अल्प स्मरण शक्ति वाला होता है। दूसरा बुद्धिमान होता है और अच्छी स्मरण शक्ति वाला होता है। यह है विद्या संबंधी भाग्य।

जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है, विद्वानों का तिरस्कार करता है, ज्ञान की अवहेलना करता है, वह व्यक्ति विद्या संबंधी दुर्भाग्य का निर्माण कर लेता है। जो व्यक्ति दूसरों को अध्ययन में सहयोग देता है, ज्ञान देता है, ज्ञानियों का सम्मान करता है, वह व्यक्ति विद्या संबंधी सौभाग्य का निर्माण करता है।

एक आदमी स्वस्थ रहता है, बीमार नहीं होता, शरीर से मजबूत है, श्रम करने से थकता नहीं। दूसरा आदमी प्रायः बीमार रहता है। कभी बुखार, कभी जुकाम, कभी सिरदर्द, कभी पेटदर्द, कभी हार्ट अटैक, कभी शुगर तो कभी कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है। यह है स्वास्थ्य संबंधी भाग्य।

जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट देता है, उनका बुरा करता है, मारता-पीटता है, उसे स्वास्थ्य संबंधी दुर्भाग्य झेलना पड़ सकता है। उसके शरीर में अनेक रोग हो जाते हैं। जो व्यक्ति किसी को दु:ख नहीं देता, स्वयं कष्ट झेलकर भी दूसरों का हित करता है, अहिंसा और मैत्री का जीवन जीता है, उससे स्वास्थ्य संबंधी सौभाग्य का निर्माण होता है।

एक आदमी को प्रतिष्ठा मिलती है, उसके द्वारा कही गई बात का लोग आदर करते हैं। दूसरे व्यक्ति का असम्मान होता है, उसे कोई अधिकारपूर्ण स्थान नहीं मिलता, वह लोगों का प्रिय नहीं बन पाता। यह है प्रतिष्ठा संबंधी भाग्य।

जो व्यक्ति अहंकार करता है, दूसरों की निंदा करता है, उदंडतापूर्ण व्यवहार करता है, वह व्यक्ति प्रतिष्ठा संबंधी दुर्भाग्य का निर्माण कर लेता है। जो व्यक्ति अहंकार नहीं करता, दूसरों की प्रशंसा करता है, शालीनतापूर्ण व्यवहार करता है, वह व्यक्ति प्रतिष्ठा संबंधी सौभाग्य का निर्माण करता है।

एक व्यक्ति प्रायः शांत रहता है और विनम्र होता है, और सहजता का जीवन जीता है। जबकि दूसरा व्यक्ति अशांत होता है, छोटी-सी बात पर भी आवेश में आ जाता है, क्रोधित होकर अपशब्द बोलना शुरू कर देता है। यह है भावना संबंधी भाग्य। सरलता

दुर्विचार वाला व्यक्ति भावात्मक दुर्भाग्य का निर्माण कर लेता है तथा सविचार वाला व्यक्ति भावात्मक सौभाग्य का निर्माण कर लेता है।

इसी प्रकार जिस व्यक्ति ने दूसरों को धोखा दिया हो, उसे बेवफा सहयोगी मिलेंगे। जिस व्यक्ति ने दूसरों के साथ अच्छा किया हो, उसे वफादार सहयोगी मिलेंगे। सच तो यह है कि मनुष्य स्वयं ही अपने सौभाग्य और दुर्भाग्य का निर्माण करने वाला है।

संसार में एक आदमी पुण्यात्मा है, सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है, दुराचारी है और सुख भोग रहा है-इस बात को लेकर अच्छे-अच्छे पुरुषों के भीतर भी यह शंका हो जाया करती है कि इसमें ईश्वर का न्याय कहाँ है। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रही है, यह पूर्व के किसी जन्म में किये हुए पाप का फल है, अभी किये हुये पुण्य का नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है, वह भी पूर्व के किसी जन्म में किये हुये पुण्य का फल है, अभी किये हुये पाप का नहीं।

कर्म का फल तो भोगना पड़ता है। इतिहास साक्षी है कि बड़े-बड़े सम्राट, महाराजाधिराज, ज्ञानी-ध्यानी, ऋषि-मुनि और पराक्रमी, बलशाली व्यक्ति भी अपने कर्मों के फल भोगने के लिए विवश रहे।

याद रखें, आपके साथ जो प्रतिकूल समय बीत रहा है, उसका कारण आपके पूर्व जन्म के कर्मफल (प्रारब्ध) भी हो सकते हैं। क्योंकि बिना कारण से कोई कार्य नहीं होता। इस बात पर ध्यान रखें कि आपके द्वारा कमाया हुआ धन किस तरह का है। गलत तरह से या नाजायज मुनाफा लेकर, इन दोनों में से एक या दोनों तरह से कमाया हुआ धन आप और आपके परिवार में से ही निकलेगा। जैसे

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